समय को बर्बाद करके खुद को किया आबाद! आशुतोष उज्जवल की कामयाबी की कहानी।

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क्या आप भी समय बर्बाद कर रहे हैं ? क्या आपको लगता है की समय बर्बाद करने से कोई सफल बन सकता है ? शायद आप यकीन ना करें लेकिन यह कहानी है ‘ गंगानगर’ नामक एक छोटे से गांव से बहुत बड़े-बड़े सपने और ढेर सारे संकोच लेकर निकले आशुतोष उज्जवल जो कि 57 लाख से अधिक ग्राहकों वाली प्रसिद्ध वेबसाइट ‘The Lallantop’ की शुरुआत करने वाले 6 लोगों में से एक हैं, अपनी सफलता से पहले केवल समय बर्बाद किया करते थे।
आशुतोष जी के जिंदगी बहुत ही उतार-चढ़ाव से भरी हुई है| आशुतोष जी कहते हैं कि अपनी जिंदगी से उन्होंने एक सीख ली है और यह उनकी ताकत भी रही है। यह ठीक है कि जिंदगी में कोई भी काम करो पूरे मन से करो। अगर आप अपना समय भी बर्बाद कर रहे हैं तो पूरे मन से बर्बाद करो। आशुतोष जी का मानना है कि लोग कहते हैं कर्म ही पूजा है, पर जिसके पास कर्म अर्थात काम ही नहीं है उसके लिए समय बर्बाद करना उससे भी बड़ी पूजा है। और आशुतोष जी ने भी यही किया समय को बर्बाद करके खुद को काबिल और कामयाब बनाया है।आशुतोष जी का बचपन गांव में और साथ ही साथ अभाव में भी बीता है। इनके गांव की स्थिति इतनी खराब है कि वहां चार-पांच किलोमीटर की दूरी तक भी कोई ट्रांसपोर्ट की सुविधा उपलब्ध नहीं है। आशुतोष जी की आर्थिक स्थिति शुरू से ही बहुत खराब थी। पढ़ाई में इनका मन कभी नहीं लगता था। इन्होंने तीसरी कक्षा से ही नोट्स ना बनाने का रिकॉर्ड बनाया है जिसके कारण इनकी लिखावट भी बहुत खराब है। परंतु अपने आरंभिक दिनों से ही इन्हें जोक्स लिखने का बहुत शौक था। इसके साथ ही उन्हें सोशल मीडिया पर राजनीतिक व्यंग्य और वन लाइनर लिखने का भी जुनून था|
पढ़ाई में बेहद कमजोर होने के बावजूद भी यह कभी बोर्ड एग्जाम में फेल नहीं हुए। जैसे तैसे करके उन्होंने 12वीं पास की। उसके बाद जब ग्रेजुएशन करने का समय आया तो गांव से दूर-दूर तक कॉलेज नहीं था। जहां से आगे की पढ़ाई की जा सके और ना ही कोई मार्गदर्शन कराने वाला था कि आगे क्या पढ़ाई की जाए? आशुतोष ने अपने बड़े भाई से क्रिश्चियन कॉलेज के बारे में सुना था। उन्होंने उस कॉलेज के बारे में पता लगाया और बी. ए के लिए फॉर्म भर दिया। जैसे तैसे करके तिसरी श्रेणी से पास हुए। उन्होंने फर्स्ट ईयर तो निकाल लिया लेकिन सेकंड ईयर में फेल हो गये। यह उनके लिए बहुत बड़ा झटका था क्योंकि वह कभी भी फेल नहीं हुए थे। दूसरा झटका इन्हें तब लगा जब यह सेकंड ईयर में ही दूसरी बार फेल हो गए और जब यह तीसरी बार फेल हुए तो इनको यह लगा कि यह पढ़ाई लिखाई मेरे लिए नहीं बनी है। उसके बाद उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और सन् 2008 में लखनऊ में कंप्यूटर ऑपरेटर की प्राइवेट जॉब करने लग गए। लेकिन नौकरी करने के बावजूद भी इनकी आर्थिक स्थिति में कोई सुधार ना आया था और उस समय भी स्थिति इतनी खराब थी कि ऑटो के ₹5 बचाने के लिए वह 2-3 किलोमीटर पैदल चले जाते थे। आशुतोष को पता था कि यहां पर काम करने से कुछ भी बदलाव नहीं होने वाला और ना ही कैरियर बन सकता है। फिर भी उन्होंने 2010 तक वहीं पर काम किया। इसके बाद वह अपने गांव वापस आ गए | वहां पर वह गाय चराया करते और अपना टाइम बर्बाद किया करते थे| आशुतोष जी का कहना है कि अकेले उनका टाइम पास नहीं होता था इसलिए 2011 में 22 साल की उम्र में उन्होंने शादी कर ली।फिर कुछ समय के बाद गांव वालों के ताने सुनने की वजह से आशुतोष दिल्ली में अपने एक दोस्त के पास चले गए। वहां उन्होंने कुछ दिन आराम से गुजारा और फिर एक दिन उन्होंने अखबार में देखा कि बेल्ट की दुकान पर सेल्समैन की जरूरत है।अगले दिन सुबह दुकान पर पहुंच गए। वहां से आधा दिन ही काम किया था कि उन्हें एहसास हुआ कि उनसे यह काम ना होगा और वापस अपने गांव लौट आए। वहां से लगभग 1 साल तक खाली समय बर्बाद किया | 2013 में आशुतोष जी के घर एक बेटी हुई। उसके बाद घर में दबाव बढ़ने लगा जिसकी वजह से उन्होंने गांव में एक मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोली। पर आशुतोष जी का मानना है कि उनके अंदर सेल्समैन का हुनर नहीं था, जिसकी वजह से ग्राहक दुकान पर नहीं आते थे | उस समय इनके पास बहुत सारा समय खाली रहता था तो इन्हें फेसबुक और फिल्मों की लत लग गई। आशुतोष जी हॉलीवुड के हिंदी डब फिल्में देखा करते थे | 2014 में चुनाव के दौरान वह बहुत सक्रिय हो गए और बहुत सारे पॉलीटिकल सैटायर और one-liner लिखने लग गए। जिससे उनकी फोल्लोविंग बढ़ने लगी और बड़े-बड़े लोग इन्हें जानने लगे। परंतु इससे कमाई नहीं हो रही थी। इसलिए उन्होंने एक दिन फेसबुक पर पोस्ट लिखी कि मुझे नौकरी की जरूरत है। तभी एक बनारस की व्यक्ति ने उन्हें अपनी फैक्ट्री में काम करने के लिए बुलाया और लगभग 10 माह तक उन्होंने वहां काम किया। एक दिन रात को जब वह सोने जा रहे थे तभी फेसबुक पर उन्हें उनके कुलदीप नामक एक दोस्त का संदेश आया और कहा क्या तुम दिल्ली में काम करना चाहते हो? आशुतोष ने कहा हां, पर काम क्या करना है? उन्होंने जवाब दिया कि हम एक वेबसाइट बनाना चाहते हैं आप जैसे लोगों के साथ। आशुतोष ने उस समय इनकी बात को मजाक में लिया था। तभी एक दिन उन्हें उनके एक मित्र का फोन आया और उसने बताया कि मैं भी इसी संदेश के जवाब में दिल्ली आया था। यह बहुत अच्छे लोग हैं और बहुत ही अच्छा काम है। तुम भी जल्दी दिल्ली आ जाओ। मित्र के कहने पर आशुतोष जी ने अपना पुराना काम रिस्क लेकर छोड़ दिया और नोएडा ऑफिस पहुंचने पर वह सौरभ द्विवेदी जो कि ‘द लल्लनटॉप’ के सरपंच और एडिटर हैं उनसे मिले | उन्होंने बहुत ही पॉजिटिव तरीके से आशुतोष जी को समझाया कि हमें इस प्रकार से मिलकर काम करना है कि पूरी दुनिया हमसे जुड़ी रहे | उनसे बात करने के बाद वह फिर अपने गांव वापस चले गए और उनके फोन आने के इंतजार में दो-तीन महीने तक समय बर्बाद किया। फिर जुलाई 2015 में इन्हें काम शुरू करने के लिए बुलावा आया और वह दिल्ली चले गए | वहां ऑफिस ज्वाइन करने के बाद 6 महीने तक सभी लोगों ने खूब तैयारी की। 2015 में ही दिसंबर के अंत में ‘द लल्लनटॉप’ वेबसाइट लॉन्च कर दी| यह एक अंतर के साथ एक समाचार वेबसाइट है जो कि हिंदी में अनौपचारिक और रोमांचक तरीके से समाचार विचार और राय अपलोड करती हैं आज के समय में इसके विचार और ग्राहक तीव्र गति से बढ़ते ही जा रहे है |’The Lallantop’ भारत का सबसे लोकप्रिय और नंबर 1 नए जमाने का समाचार ब्रांड है, पर 10 मिलियन से अधिक ग्राहक आधार तक पहुँचकर एक और उपलब्धि हासिल कर चुका है। जनवरी 2018 में मिलियन सब्सक्राइबर मार्क मारने के बाद, द लल्लटटॉप को YouTube पर 10 मिलियन सब्सक्राइबर बनाने के लिए सिर्फ 22 महीने लगे।YouTube पर सभी डिजिटल-प्रथम मूल समाचार चैनलों में, लल्लनटॉप विश्व स्तर पर इस उपलब्धि को हासिल करने वाला पहला है और कई विरासत वैश्विक और राष्ट्रीय समाचार ब्रांडों को पीछे छोड़ दिया है।

आशुतोष जी कहते हैं कि 
चाहे कितनी भी मुश्किलें मेरी राह में आई लेकिन मेरे मन में हमेशा एक ख्याल रहता था कि मुझे कुछ बड़ा करना है और आज  ऐसा करके दिखाया। 

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