अंधेरे कमरे से TV के चकाचौंध तक ज्योति मिश्रा (न्यूज़ एंकर इंडिया टीवी)

लहरों को शांत देखकर यह मत समझना, कि समंदर में रवानी नहीं है। जब भी उठेंगे तूफान बन कर उठेंगे, बस अभी उठने की ठानी नहीं है।।

देश और दुनिया की तमाम बड़ी खबरों के साथ मैं हूं ज्योति मिश्रा। हम लोगों ने ऐसा बोलते हुए इन्हें टीवी पर कई बार देखा या सुना होगा।ज्योति मिश्रा के पिताजी आर्मी में थे। इनके पिताजी की नियुक्ति हैदराबाद में हुए, इसलिए ज्योति जी का जन्म और पालन-पोषण सब हैदराबाद में हुआ ।लेकिन यह वास्तव में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिला के रहने वाले हैं। इनका पूरा खानदान अभी भी जौनपुर में ही रहता है। इनकी मां एक शिक्षिका थी और वह चाहती थी कि बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा मिल सके ।आर्मी स्कूल से बेहतर और क्या हो सकता था। तब इन लोगों ने हैदराबाद में ही रहने का फैसला किया। हालांकि हैदराबाद में रहना उनके लिए बहुत आसान नहीं था। ज्योति जी जब सात आठ साल की थी तब इनके पिताजी रिटायर हो गए। उस समय तब इनकी स्थिति बहुत अच्छी थी। यह बड़े ऐशो आराम की जिंदगी जी रहे थे। दुनिया की सारी सुख सुविधाएं इनके पास थी। कोई दिक्कत नहीं था लेकिन इनके पिता जी की रिटायरमेंट के बाद इनके पिताजी ने अपनी सारी पूंजी व्यापार में लगा दी और कोशिश की कि शायद मैं अपने परिवार के लिए और कुछ अच्छा कर सकूं। लेकिन इनके पिताजी की बदकिस्मती इनके पिता जी का साथ नहीं दी और धीरे-धीरे इनकी सारी बचत कुंजी खत्म होती चली गई।
एक ऐसा आया जब ज्योति जी के पिता जी बहुत बड़े नुकसान में चले गए। इनकी आर्थिक स्थिति एकदम खराब हो गई। उसके बाद इनका ऐसा समय आया कि यह लोग जिस घर में रहते थे उस घर को खाली करने को कहा गया। उस घर को खाली करना कोई बड़ी बात नहीं थी। लेकिन ज्योति जी के पिताजी का कहना था कि खुद्दारी बहुत बड़ी चीज है। बिना किसी वजह और बिना किसी गलती के हम जहां रह रहे है हम वहां से क्यों हटे। इस लड़ाई में बच्चे भी पिस रहे थे। लेकिन इन बच्चों को यह समझ नहीं आ रही थी कि यह क्या कर सकते हैं ? जब ज्योति जी नोट 10 साल की रही होंगी तब जिनसे इनकी लड़ाई चल रही थी उनकी हर मुमकिन कोशिश थी कि वह कैसे घर खाली करे और यहां से चले जाएं ।लेकिन ज्योति जी के माता-पिता जी की जिद थी कि उन्हें भी यही रहना है। इस चक्कर में इनके घर की सारी सुविधाओं को बंद कर दिया गया औरबिजली काट दी गई। ज्योति जी ने अपनी बोर्ड की परीक्षा बिना बिजली वाले घर से लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करके दी। तब इनकी जिंदगी की यही कोशिश थी कि आज का दिन इनका जैसे तैसे बीत जाए और इनकी बचपन किसी तरह से निकल जाए। किसी तरह से बड़ी हो जाए और सारी जिम्मेदारियां खुद पर ले ले और सारी समस्याओं दूर कर दें। ये सारी बातें इनके दिमाग में हमेशा चलती रहती थीं।
एक दिन की बात है जब ज्योति जी अपने माता-पिताजी के साथ अपने गांव जाकर वापस लौट रही थी। तब इनके पिताजी के पास एक फोन आया कि आपके घर में आग लगा दी गई है। इन को वहां से हटाने के उद्देश्य से आग लगाया गया था।तब इनके पास ना कोई किताब थी और ना ही कपड़े। इनके घर का सारा सामान यहां तक कि राशन भी जला दिया गया था। तब हैदराबाद जैसे शहर में इनके पास कुछ भी नहीं था। उस दिन ज्योति जी ने अपने माता पिता जी को टूटते हुए देखा था। फिर ज्योति जी ने सोचा कि यह बिना किसी उद्देश्य की जिंदगी जी रही है और यह भी सोचने पर मजबूर हो गई कि क्यों मेरे माता-पिता इतना संघर्ष कर रहे हैं? इतने बुरे दिन देख रहे हैं? इनकी पारिवारिक स्थिति गांव की बेहद अच्छी है। वह चाहे तो गांव वापस चले जा सकते हैं जहां हर चीज की सुविधा है। वह खुद को खुश रख सकते हैं। लेकिन यहां सारी मुसीबतों का सामना क्यों कर रहे हैं? ताकि ज्योति जी और इनके भाई को एक अच्छी शिक्षा मिल सके। इस सोच ने ज्योति जी को हिला कर रख दिया। इस ट्रेड को वापस आने में कुछ समय लगा। इस घटना के बाद ज्योति जी क्लास 12वीं में थी तब ज्योति जी ने यह कोशिश की कि मैं कुछ बड़ा करके दिखाऊंगी ।अपने माता-पिता की मेहनत को बर्बाद नहीं होने दे सकती थी। तब बस ज्योति जी ने यह बात उसी दिन से गांठ बांध ली। आज घर नहीं है ।आज सामान जल गये है इतने दिन से इनके माता-पिता की जो गृहस्ती थी ,खून पसीने की वह जो मेहनत थी कुछ भी नहीं है। ज्योति जी की 12वीं की पढ़ाई जैसे ही खत्म हुई इनके पिताजी और इनके भाई ने बायोटेक का फॉर्म लाकर उन्हें दिया। ज्योति जी ने जैसे ही देखा विज्ञान उन्होंने फाडकर फेंक दिया । तब ज्योति जी ने अपनी पढ़ाई चयन कर लिया था, जो थी मास कम्युनिकेशन जर्नलिज्म ।ज्योति जी ने इसकी पढ़ाई 3 साल बहुत अच्छे से की और बहुत अच्छे नंबर भी आए। अपने आपको तथा अपने खर्चों को सपोर्ट करने के लिए वह सुबह कॉलेज जाती थी और शाम को ट्यूशन पढ़ाती थी। इनके जो खुद के खर्च थे वो आराम से बैलेंस हो गए। ऐसी कोई दिक्कत इन्होंने खुद के लिए नहीं आने दी। कॉलेज में 3 साल के बाद यह एक चीज क्लियर हो गई कि अगर ज्योति जी किसी चीज में सर्वोत्तम है तो वह है कैमरा फेस करना, वह है एंकरिंग करना, क्योंकि कॉलेज में इनकी प्रोजेक्ट होते थे या कोई शो होते थे तब छोटी सी छोटी चीजों चीजों से इन्हें एहसास हुआ कि शायद यही इनका प्रोफेशन होगा। इसी दिशा में ज्योति जी को आगे बढ़ना है ।अपना एक गोल हासिल करना है। 19 साल की उम्र में इन्हें पहली नौकरी मिली। लेकिन वह बहुत आसान नहीं था क्योंकि प्रोफेशन में इनका कोई रिश्तेदार जो इन्हें मार्गदर्शन करा सके ऐसा कुछ नहीं था। तो यह यलो पेज डायरेक्टरी किताब से जितने भी टीवी चैनल मिले इन्होंने सब में अप्लाई कर दिया। लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं आया। काम तो करना ही था। फिर ज्योति जी ने मन मार कर जैसे-तैसे एक एड एजेंसी जॉइन की। इनका मन उसमें एक दम नहीं लगता था। बड़ी मुश्किल से तब इनका एक एक दिन बीता करता था। 20 25 दिन के बाद इन्हें ईटीवी से बुलावा आया। यहां से इनके सपनों का दरवाजा खुलना शुरू हो गया। पूरे भारत देश से लोग आए थे ऑडिशन करने के लिए। इनका ऑडिशन बहुत अच्छा रहा और इंटरव्यू भी ठीक-ठाक ही था। टीवी में जो 1 महीने की ट्रेनिंग होती है एंकरिंग की, वह सब इन्होंने अच्छे से निकाला और एक अलग ज्योति बनकर उभरी। इतनी डरी सहमी सी जो लड़की गई थी वह एक एंकर बनकर बाहर निकली ।ईटीवी में जब एंकरिंग के दिन शुरू हुए 19 साल की एक लड़की जिसको मीडिया की कोई खबर नहीं ,उनके लिए चुनौतियों से भरा क्षेत्र था। ईटीवी में काम करते-करते फिर 1 दिन इन्हें इंडिया टीवी से कॉल आया ।इनके लिए सबसे बड़ा मौका था कि किसी नेशनल चैनल में काम करना। इनका यह सपना पूरा होने की कगार पर ही था कि इनके पिताजी को आईसीयू में भर्ती किया गया। इनकी पहली प्राथमिकता इनकी परिवार थी। दूसरी प्राथमिकता इनका इतना अच्छा सपना नेशनल चैनल का था‌। डॉक्टर साहब ज्योति जी को अस्पताल के अंदर जाने की अनुमति नहीं दे रहे थे, तब ज्योति जी को लगा कि वह 2 दिन तक अस्पताल के अंदर भी नहीं जा सकती। ज्योति जी ने सोचा कि समय क्यूं बर्बाद करें और जाकर इंटरव्यू और ऑडिशन दिया ।सोचा कि तब ज्योति जी को कोई होश नहीं था कि वह कहां आई है ,क्या बोल रही है और किस चैनल में आई है। शाम होने के बाद पता चला कि इन्होंने इंटरव्यू का हर दौर को पूरा किया है और वह पास कर गई है 1 नेशनल चैनल के लिए इन्हें नियुक्त भी कर लिया गया है। इस खुशी का इनको कोई ठिकाना नहीं था। ज्योति जी को विश्वास नहीं हो रहा था कि वह नेशनल चैनल में नियुक्त हो गई है और इनका 9 साल का रीजनल चैनल खत्म हो गया। जब वह घर गई तो इनके पिताजी की स्थिति में भी सुधार हो रहा था । फिर जब इनके पिताजी अस्पताल से घर आ गए तब ज्योति जी ने अपने माता पिता को बताया कि मुझे नेशनल टीवी में चांस मिल गया है और अब मुझे दिल्ली जाना है‌ कृपया आप मुझे दिल्ली जाने दीजिए ज्योति जी ने अपने माता पिता को बहुत मनाना पड़ा। अंततः इनके माता पिता जी को ज्योति जी को दिल्ली भेजना ही पड़ा।

तराशा है हमने खुद को हीरे की तरह ,
लोग जितने भी चोट देंगे हम और निखर थे जाएंगे। 

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